प्यार और आकर्षण को समझने के लिए हमें मोह को भी समझना पड़ेगा क्योंकि मोह को समझे बिना प्यार और आकर्षण को समझा नहीं जा सकता। इसलिए आज हम तीनों के बारे में जानेगे।
प्यार तब तक जन्म नहीं ले सकता जब तक हम अपनी नकारात्मक भावनाओं(मोह, गुस्सा, अहंकार, ईर्ष्या, लालच आदि।) पर काबू नहीं करते। प्यार तो सिर्फ देने का ही नाम होता है, लेने का नहीं । मिलना तो आटोमेटिक होता है। इसमें अनरियलिस्टिक एक्सपेक्टेशन नहीं होती। क्योंकि एक्सपेक्टेशन तो रिश्तों में होती है लेना देना रिश्तों में होता है, प्यार में नहीं।
प्यार पूरी तरह एकतरफा होता है दोतरफा नहीं, प्यार को हम दूसरी साइड से नियंत्रित नहीं कर सकते, अगर करते हैं तो हम प्यार नहीं करते सिर्फ अपना मतलब ही साधते हैं जो हमारे अंदर की नकारात्मक भावनाओं के कारण होता है। इसे काबू किए बिना हम प्यार के लेवल को छू नहीं पायेंगे, सिर्फ मोह तक सीमित रह जायेंगे।
आज के परिवेश में हमने मोह को ही प्यार समझ लिया है, जबकि प्यार समर्पण है, कोई फैशन नहीं। प्यार के लिए बहुत समझदारी चाहिए। इसमें अपने अहंकार को परे रखना पड़ता है।
इसके लिए हमें अपने आपको अंदर से इतना मजबूत बनाना चाहिए कि हम प्यार देनें वाले बने न कि मांगने वाले क्योंकि जब आप मांगते हो तो आप अपनी वैल्यू कम करते हो और दूसरो को अपना फायदा उठाने का मौका देते हो।
प्यार में हम सामने वाले पर कब्जा करने की कोशिश नहीं करते बल्कि उसे स्वतंत्र छोड़तें है यदि वह आपका है तो वह कहीं नहीं जाएगा
प्यार में हम सिर्फ रियलिस्टिक एक्सपेक्टेशन रखते हैं।
मोह में बहुत उम्मीदें होती हैं और यही उम्मीदें पूरी न होने पर हमें दुःख में डालती हैं। मोह में हम दूसरे की मानसिक स्थिति से जुड़ जाते हैं इसलिए जब वह खुश होता है तो हम खुश होते हैं जब वह दुःखी तो हम भी दुःखी । मोह में हमें सामने वाले की असलियत ही दिखाई नहीं देती और हम धोखा उठा जाते हैं। जैसे-जैसे हमारी समझदारी बढ़ती है मोह कम होता है और हम चीजों को अच्छे से देख पाते हैं।
पर मोह को मैं रिश्ते और प्यार के लिए जरूरी मानता हूँ पर ये मोह कभी भी आपके रिश्ते और प्यार से बड़ा नहीं होना चाहिए और हमेशा आपके नियंत्रण में होना चाहिए। जब भी ये मोह रिश्ते और प्यार से बड़े होने लग जाते हैं तो ये रिश्ते और प्यार दोनों को खतरे में डाल देते हैं।
जब भी हमें कोई व्यक्ति, वस्तु, काम, परिस्थिति हमेशा के लिए निःस्वार्थ भाव से अच्छी लगने लग जाती है और हमारा जुनून और समर्पण कभी भी इसके लिए कम नहीं होता फिर चाहे परिस्थितियाँ कैसी भी क्यों न हो और उस व्यक्ति, वस्तु,काम, परिस्थिति में कोई बुराई भी क्यों न हो फिर भी हम उस बुराई को भी स्वीकार करते हुए उससे प्यार करें और हमारा प्यार उसके लिए हमेशा बना ही रहे तो फिर वास्तव में हम इसे प्यार कह सकते हैं और हाँ किसी के लिए भी हमारा निस्वार्थ जुनून मोह नहीं होता क्योंकि मोह में जब हम किसी की बुराई को देखते हैं जो हमें पसंद नहीं है तो हमारा लगाव उससे कम होते हुए अंत में खत्म हो जाता है लेकिन प्यार में हमारा लगाव, जुनून और समर्पण उससे कभी खत्म नहीं होता हमेशा बना ही रहता है।
प्यार
खुद को जान लेना प्यार है। अपने अहंकार को छोड़कर समर्पित होना प्यार है। अगर हमारे अंदर कोई सेलफिश मोटिव होता है तो हम प्यार नहीं कर सकते।प्यार तब तक जन्म नहीं ले सकता जब तक हम अपनी नकारात्मक भावनाओं(मोह, गुस्सा, अहंकार, ईर्ष्या, लालच आदि।) पर काबू नहीं करते। प्यार तो सिर्फ देने का ही नाम होता है, लेने का नहीं । मिलना तो आटोमेटिक होता है। इसमें अनरियलिस्टिक एक्सपेक्टेशन नहीं होती। क्योंकि एक्सपेक्टेशन तो रिश्तों में होती है लेना देना रिश्तों में होता है, प्यार में नहीं।
प्यार पूरी तरह एकतरफा होता है दोतरफा नहीं, प्यार को हम दूसरी साइड से नियंत्रित नहीं कर सकते, अगर करते हैं तो हम प्यार नहीं करते सिर्फ अपना मतलब ही साधते हैं जो हमारे अंदर की नकारात्मक भावनाओं के कारण होता है। इसे काबू किए बिना हम प्यार के लेवल को छू नहीं पायेंगे, सिर्फ मोह तक सीमित रह जायेंगे।
आज के परिवेश में हमने मोह को ही प्यार समझ लिया है, जबकि प्यार समर्पण है, कोई फैशन नहीं। प्यार के लिए बहुत समझदारी चाहिए। इसमें अपने अहंकार को परे रखना पड़ता है।
- प्यार में मैं या तू नहीं होता बल्कि हम होता है।
- प्यार में सम्मान और विश्वास होता है।
- प्यार में दिल से स्वीकार्यता होती है फिर चाहे सामने वाला कैसे भी नेचर का हो।
- प्यार में सामने वाले को हम बदलते नहीं है बल्कि वो जैसा है वैसा स्वीकार करते हैं।
- प्यार मन का ठहराव है।
- प्यार हमेें अंदर से खुशी देता है सिर्फ आनंद नहीं।
- प्यार हमें इस लायक बनाता है कि हम यह जान सके कि हमारे लिए और हमसे जुड़े लोगों के लिए क्या सही है क्या गलत।
- प्यार वह भाव है जो हमें अंदर से शांत और संतुष्ट रखता है।
इसके लिए हमें अपने आपको अंदर से इतना मजबूत बनाना चाहिए कि हम प्यार देनें वाले बने न कि मांगने वाले क्योंकि जब आप मांगते हो तो आप अपनी वैल्यू कम करते हो और दूसरो को अपना फायदा उठाने का मौका देते हो।
प्यार में हम सामने वाले पर कब्जा करने की कोशिश नहीं करते बल्कि उसे स्वतंत्र छोड़तें है यदि वह आपका है तो वह कहीं नहीं जाएगा
प्यार में हम सिर्फ रियलिस्टिक एक्सपेक्टेशन रखते हैं।
मोह
जब हम मोह में होते हैं तो हमें यह समझ नहीं आता कि हमारे लिए या सामने वाले के लिए क्या सही है क्या गलत हम सिर्फ वही करते हैं जो हम सही समझते हैं, इसलिए हमने अगर अपने आप में समझदारी नहीं जोड़ी तो प्यार तक नहीं पहुंच पायेंगे। मोह हमें वास्तविकता से दूर करता है।मोह में बहुत उम्मीदें होती हैं और यही उम्मीदें पूरी न होने पर हमें दुःख में डालती हैं। मोह में हम दूसरे की मानसिक स्थिति से जुड़ जाते हैं इसलिए जब वह खुश होता है तो हम खुश होते हैं जब वह दुःखी तो हम भी दुःखी । मोह में हमें सामने वाले की असलियत ही दिखाई नहीं देती और हम धोखा उठा जाते हैं। जैसे-जैसे हमारी समझदारी बढ़ती है मोह कम होता है और हम चीजों को अच्छे से देख पाते हैं।
पर मोह को मैं रिश्ते और प्यार के लिए जरूरी मानता हूँ पर ये मोह कभी भी आपके रिश्ते और प्यार से बड़ा नहीं होना चाहिए और हमेशा आपके नियंत्रण में होना चाहिए। जब भी ये मोह रिश्ते और प्यार से बड़े होने लग जाते हैं तो ये रिश्ते और प्यार दोनों को खतरे में डाल देते हैं।
आकर्षण
जब हम किसी के गुणों को देखकर जो हमें अच्छे लगते हैं या जिसके कारण हम अच्छा महसूस करते हैं तो हम उसकी तरफ आकर्षित हो जाते हैं। मै सिर्फ इन्सानों की बात नहीं करता बल्कि चीजों, अपने काम और परिस्थितियों के बारे में भी कहता हूँ क्योंकि हम इसकी तरफ भी आकर्षित होतें हैं और जैसा हमारा मन होता है अगर उसी के अनुसार कुछ हो रहा होता है तो हम उसकी तरफ आकर्षित हो जाते हैं और तो और हम किसी की सोच से भी आकर्षित हो जाते हैं जब यही आकर्षण बार बार होता है तो हम मोह की तरफ अग्रसर होते हैं यह आकर्षण प्यार में तब बदलना शुरु होता है जब हम किसी के लिए नि:स्वार्थ भाव से कुछ करना शुरू करते हैं और इसमें हमें खुशी मिलती है जब हमारे अंदर करूणा का जन्म होता है तो यह भी प्यार के होने का संकेत होता है।जब भी हमें कोई व्यक्ति, वस्तु, काम, परिस्थिति हमेशा के लिए निःस्वार्थ भाव से अच्छी लगने लग जाती है और हमारा जुनून और समर्पण कभी भी इसके लिए कम नहीं होता फिर चाहे परिस्थितियाँ कैसी भी क्यों न हो और उस व्यक्ति, वस्तु,काम, परिस्थिति में कोई बुराई भी क्यों न हो फिर भी हम उस बुराई को भी स्वीकार करते हुए उससे प्यार करें और हमारा प्यार उसके लिए हमेशा बना ही रहे तो फिर वास्तव में हम इसे प्यार कह सकते हैं और हाँ किसी के लिए भी हमारा निस्वार्थ जुनून मोह नहीं होता क्योंकि मोह में जब हम किसी की बुराई को देखते हैं जो हमें पसंद नहीं है तो हमारा लगाव उससे कम होते हुए अंत में खत्म हो जाता है लेकिन प्यार में हमारा लगाव, जुनून और समर्पण उससे कभी खत्म नहीं होता हमेशा बना ही रहता है।
प्यार और आकर्षण में अंतर
अगर आप प्यार और आकर्षण के बीच अंतर समझना चाहते हैं तो निम्न बिन्दुओ में जानते हैं क्या basic different है प्यार और आकर्षण के बीच?- आकर्षण किसी से भी हो सकता है प्यार नहीं
- आकर्षण में व्यक्ति कंट्रोल नहीं कर पाता
- आकर्षण में बेवजह तारीफ़ की जाती हैं प्यार में नहीं
- आकर्षण में उपहार का महत्व है जबकि प्यार एक भावना है
- आकर्षण एक समय बाद ख़त्म हो जाता है जबकि प्यार बढ़ता है
- प्यार में जलन की भावना होती है आकर्षण में नहीं
- आकर्षण में व्यक्ति अपनी ख़ुशी देखता है जबकि प्यार में पार्टनर की
- आकर्षण पाने का और प्यार त्याग का नाम है


0 टिप्पणियाँ